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लेखनी कहानी -28-Dec-2022

नादान

मैं नादान थी मैं नादान थी
समझ न सकी में उसके हाव-भाव को ,
समझ ना सकी उसके गालों की लाली को,
पढ़ ना सकी उसके आंखों की भाषा को,

उसका यूं अनायास मुस्कुराना
जुबा के अलावा उसके रोम रोम का यूं बोलना , 
एक रहस्यमय अंदाज से देखना,

वह आतुर था बहुत कुछ बताने को,
अपने दिल की जुबान खोलने को,
अपना सब कुछ समर्पण करने को,
कोशिश थी उसकी साथ साथ आसमान में उड़ने की,
समझ न सकी मैं उसके हाव-भाव को,
मैं नादान थी मैं नादान थी
उसका चिंता करने का ढंग 
उस से हर्षता मेरा अंग अंग 

उसके लिखने का तरिका
बात करने का सलिका
उसके बातोसे छलकता 
मोहब्बत का रस 
कभी समझ ना आया 
मै नादान थी मै नादान थी
  - अभिलाषा देशपांडे
दैनिक प्रतियोगिता हेतु मेरी रचना प्रस्तुत है। 

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4 Comments

Mahendra Bhatt

29-Dec-2022 10:10 AM

शानदार

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बेहतरीन

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